भगवान श्री हनुमानजी के बारे में
श्री हनुमानजी का जन्म
श्री हनुमानजी महाराज का जन्म (प्रागट्य दिन) चैत्र सुद पुनम, मंगलवार के दिन हुआ था ।
प्रागट्य दिन
कल्पभेद से कोई भक्त चैत्र सुद 1 मघा नक्षत्र को मानते है । कोई कारतक वद 14, कोई कारतक सुद 15, कोई मंगलवार तो कोई शनिवार मानते हैं । लेकिन भावुक भक्तों के लिए अपने आराध्यदेव के लिए सभी तिथीयाँ शुभ और श्रेष्ठ मानी जाती हैं ।
भगवान शिव, श्री हनुमानजी के आराध्य देव और श्रीराम की लीला के दर्शन हेतु और मुख्यतया उनकी श्रीराम के शुभ कार्यों में सहायता प्रदान हेतु अपने अंश ग्यारहवें रुद्र से शुभतिथी अनु शुभ मूर्हुत में माता श्री अंजनी के गर्भ से श्री पवनपुत्र महावीर हनुमानजी के रुप में धरती पर उनका प्रागट्य हुआ । मूल ग्यारहवें रुद्र भगवान शिव के अंशज, भगवान श्री विष्णु (श्रीराम) की सहायता हेतु प्रगट हुए ।
श्री अंजनीमाता के पति श्री केसरी होने के कारण श्री हनुमानजी केसरी नंदन भी कहे जाते हैं ।
श्री हनुमानजी की बाल्यावस्था एवं उसकी कथाएं
माता श्री अंजनी और कपिराज श्री केसरी हनुमानजी को अतिशय प्रेम करते थे । श्री हनुमानजी को सुलाकर वो फल-फूल लेने गये थे इसी समय बाल हनुमान भूख एवं अपनी माता की अनुपस्थिति में भूख के कारण आक्रन्द करने लगे । इसी दौरान उनकी नजर क्षितिज पर पड़ी । सूर्योदय हो रहा था । बाल हनुमान को लगा की यह कोई लाल फल है । (तेज और पराक्रम के लिए कोई अवस्था नहीं होती । यहां पर तो श्री हनुमान जी के रुप में माताश्री अंजनी के गर्भ से प्रत्यक्ष शिवशंकर अपने ग्यारहवें रुद्र में लीला कर रहे थे और श्री पवनदेव ने उनके उड़ने की शक्ति भी प्रदान की थी ।
उस लाल फल को लेने के लिए हनुमानजी वायुवेग से आकाश में उड़ने लगे । उनको देखकर देव, दानव सभी विस्मयतापूर्वक कहने लगे कि बाल्यावस्था में एसे पराक्रम दिखाने वाला यौवनकाल में क्या नहीं करेगा ?
श्री वायुदेव ने अपने पुत्र को सूर्य के समीप जाते हुए देख चिन्ता होने लगी के कहीं मेरे पुत्र को सूर्य किरणें जला न दें, वो जल न जाये । इसी कारण श्री पवनदेव बर्फ की तरह शीतल होकर बहने लगे । वैसे भी इस अलौकिक बालक श्री हनुमान को अपनी ओर आता हुआ देखकर भगवान श्री सूर्यदेव को भी पहचानने में देर नहीं लगी की यह तो पवनपुत्र है, जो अपने पिता की तरह वायु वेग से मेरी ओर आ रहे हैं और साथ में श्री पवनदेव भी उनके पुत्र की रक्षा हेतु उड़ रहे हैं ।
सूर्यदेव ने अपना सौभाग्य समझा के स्वयं भगवान शिवशंकर, हनुमान के रुप में मुझे कृतार्थ करने आ रहे हैं । तो श्री हनुमानजी को सूर्यदेव की तरफ से आवकार मिलने पर बालक श्री हनुमानजी सूर्यदेव के रथ के साथ खेलने लगे । संयोग एसा था की उस दिन अमावस थी और संहिक्ष का पुत्र राहु सूर्यदेव को ग्रसने के लिए आया । राहु ने देखा कि श्री सूर्यदेव के रथ पर कोई बालक है । राहु उस बालक की परवा न कर सूर्य को ग्रसने के लिए आगे बढ़ा ही था की श्री हनुमानजी ने राहु को पकड़ लिया । हनुमानजी की मुठ्ठी में राहु छिटपिटाने लगा और अपने प्राण बचाकर भागकर इन्द्रदेव के पास पहुंचा और उनकी फरियाद कि के सूर्य मेरा जो ग्रास है उस अधिकार को आपने किसी और को क्यों दिया । एसा कहकर रुदन करने लगा । इन्द्रदेव चिंतित हुए की वो कौन होगा जो राहु जैसे पराक्रमी को मात कर सके ।
श्री इन्द्रदेव स्वयं ऐरावत हाथी को लेकर घटनास्थल पर पहुंचे । वहां राहु को देखकर फिर से श्री हनुमानजी ने उसको पक़ड़ लिया । राहु फिर से उनको देखकर भागने लगा और इन्द्रदेव के पास पहुंचा । तभी राहु के पीछे श्री हनुमानजी उसके पीछे भागे वहां श्री हनुमानजी इन्द्रदेव के वाहन ऐरावत को देखकर उसको कोई खाद्यपदार्थ समझ कर ऐरावत पर तूट पडे । इन्द्रदेव भी बालक की ताकत को देखकर ड़रने लगे और तभी अपनी रक्षा हेतु हनुमानजी पर अपने हथियार वज्र से प्रहार किया जो हनुमानजी की दाढ़ी पर लगा (जिसको संस्कृत में हनु (दाढ़ी) कहा जाता है और उसी वजह से हनुमानजी का नाम “हनुमान” पड़ा ।) और हनुमानजी मूर्छित हुए । अपने प्राणप्रिय पुत्र को वज्र के आघात से छटपटाते हुए देखकर वायुदेव ने अपना वेग रोक दिया और अपने पुत्र को लेकर गुफा में चले गये ।
एसा होने के कारण तीनो लोक में वायु का संसार बंध हो गया । समस्त प्राणीओ में श्वाससंचार बंद हो गया । सभी कर्म रुक गए, प्राण संकट में पड़ गये । इन्द्र आदि देवों, गन्धर्व, नाग यह सभी जीवनरक्षा हेतु ब्रह्माजी के पास गये । ब्रह्माजी सभी को अपने साथ लेकर गिरीगुफा पहुंचे और वहां जाकर बालक श्री हनुमानजी को श्री पवनदेव के हाथ से लेकर अपनी गोद में लिए तब हनुमानजी की मूर्छा दूर हुई और वे फिर से खेलने-कूदने लगे । अपने पुत्र को जीवंत देखकर प्राणस्वरुप श्री पवनदेव पहले की तरह सरलता से बहने लगे और तीनो लोक फिर से जीवंत हो उठे ।
तभी श्री ब्रह्माजी ने श्री हनुमानजी को वरदान दिया कि इस बालक को कभी ब्रह्मशाप नहीं लगेगा, कभी भी उनका एक भी अंग शस्तर नहि होगा, ब्रह्माजीने अन्य देवताओं से भी कहा कि आप इस बालक को आप भी वरदान दो तब देवराज इन्द्रदेव ने हनुमानजी के गले में कमल की माला पहनाते हुए कहा की मेरे वज्रप्रहार के कारण इस बालक का हु(दाढ़ी) तूट गई है इसी लिए यह कपिश्रेष्ठ का नाम आज से हनुमान रहेगा और मेरा वज्र भी इस बालक को नुकसान न पहुंचा सके एसा वज्र से कठोर होगा । श्री सूर्यदेव ने भी कहा कि इस बालक को में अपना तेज प्रदान करता हूं और मैं इसको शस्त्र-समर्थ मर्मज्ञ बनाता हुं । यह बालक एक अद्वितिय विद्वान वक्ता बनेगा । श्री वरुणदेव ने कहा की यह बालक जल से सदा सुरक्षित रहेगा । श्री यमदेव ने कहा कि यह बालक सदा निरोगी एवं मेरे दण्ड से मुक्त रहेगा । श्री कुबेर ने कहा कि युद्ध में विषादित नहीं होगा एवं राक्षसो से भी पराजित नहीं होगा । खुद भोलेनाथ शिवशंकर ने भी अभय वरदान प्रदान किया । श्री विश्वकर्माने भी कहा कि मेरे द्वारा निर्मित शस्त्र एवं वस्तुएं सभी से सुरक्षित रहेगा । श्री ब्रह्माजी ने पुनः वरदान दिया की पवनदेव, आपका ये पुत्र शत्रुओं के लिए भयंकर और मित्रो के लिए अभयदाता बनेगा और इच्छानुसार स्वरुप पा सकेगा । जहां जाना हो वहां जा सकेगा । उसको कोई पराजित नहीं कर सकता एसा असिम यशस्वी होगा और अदभुत कार्य करेगा ।
इस तरह बाल्यावस्था में श्री हनुमानजी चंचल और नटखट स्वभाव के थे । हाथी की शक्ति प्रमाण करने के लिए हाथी को पकड़कर उसको उठाकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते । बड़े-बड़े वृक्षों को भी जडमूल से उखाडकर फेंकते एसी अतूट शक्ति उनमें थी । एसा कोई पर्वतीय शिखर नहीं था जहाँसे श्री हनुमानजीने छलांग न लगाई हो ।
कई बार ऋषिमुनियों के आश्रम में पहुंच जाते और नादान हरकतें करते कि जिससे ऋषिमुनीओं की तपस्या एवं व्रत भंग होते । ऋषिमुनियों के कमडंल, आसन इत्यादी वृक्ष पर टाँग देते और एसी अनेक अडचने पैदा करते । आयु बढ़ने के साथ-साथ श्री हनुमानजी की नटखटता भी बढ़ती चली गई इस वजह से उनके माता-पिता भी चिंतित हुए और ऋषि के पास पहुंचे और ऋषियों को हनुमानजी की गाथा सुनाई । तभी वानरराज केसरीने कहा की हमें यह बालक कठोर तप के प्रभाव से प्राप्त हुआ है । आप उस पर अनुग्रह करो एसी कृपा करो की जिससे उसकी नटखटता में परिवर्तन हो । ऋषियों ने सोचा कि जो श्री हनुमानजी अपनी शक्तियों को भूल जाएं तो एसी हरकतें बंद हो जायेगी और उनका हित भी उसी में समाया हुआ है । ऋषि जानते थे के यह बालक का श्री राम के कार्य हेतु जन्म हुआ है । यह सोचकर भृगु और अंगिरा के वंश में उत्पन्न हुए ऋषिमुनीयों ने श्री हनुमानजी को शाप दिया की वानरवीर आपको अपने बल और तेज का ध्यान नहीं रहेगा । जब कोई आपकी कीर्ति और बल का स्मरण करायेगा तभी आप का बल बढ़ेगा । एसे शाप के कारण श्री हनुमानजी का बल एवं तेज कम हो गया और वह सौम्य स्वभाव के हो गये । इस तरह ऋषिभी प्रसन्न हुए ।
उसके बाद श्री हनुमानजी के उपनयन संस्कार हुए । भगवान श्री सूर्यनारायण को गुरु बनाया । समस्त वेदशास्त्र, उपशास्त्र सविधि प्राप्त कर श्री सूर्यनारायण के पास से शिक्षा प्राप्त करते हुए श्री हनुमानजी हर हंमेश श्री रामनाम एवं उनका स्मरण करते गये । श्री राम के स्मरण में जैसे श्री हनुमानजी भक्तिमय हो गये ।
इस तरह श्री हनुमानजी की बाल्यावस्था बहुत ही विशिष्ट एवं अदभूत रही ।
श्री हनुमानजी का सुग्रीव के साथ मिलन
श्री हनुमानजी का सुग्रीव के साथ मिलन भी पहले से ही निश्चित था ।
श्री सूर्यनारायण से शिक्षा प्राप्त करने के बाद श्री हनुमानने गुरुदक्षिणा के रुप में क्या प्रदान करे एसा पूछने पर श्री सूर्यनारायणजी ने उत्तर दिया था कि मुझे कुछ नहिं चाहिये लेकिन आप मुजे एक वचन दो कि मेरे अंश से उत्पन्न हुए वाली के छोटेभाई सुग्रीव की आप रक्षा करेंगे और उनका साथ देंगे । तब श्री हनुमानजीने विनम्रता से कहा कि मेरे रहते हुए कोई भी सुग्रीव का बाल भी बांका नहीं कर सकता और में उनके साथ रहकर उनकी रक्षा करुंगा यह मेरी प्रतिज्ञा है । एसे, श्री हनुमानजी गन्धमादत पर्वत पर से परत अपने माता-पिता के साथ वापस आये थे ।
ऋक्षर की वानरराज के दो पुत्र थे – वाली एवं सुग्रीव । दोनो बालक को अपने पिता बहुत प्रेम करते थे । दोनों बुद्धिमान एवं सुंदर थे। दोनो के बीच में प्रेम था । सुग्रीव भी वाली को पिता समान सम्मान देते थे । जब पिता दिवंगत हुए तब मंत्रीयोंने वाली को श्रेष्ठ जानकर राज्यपद दीया । कुछ समय पश्चात दोनो भाई अलग हो गए और सुग्रीव को राज्य में से निकाल दिया । वो जब मुश्किल में होते है उसी अरसे में वानरराज केसरी श्री हनुमानजी को राजनीति का ज्ञान प्राप्त कराने हेतु पम्पापुर भेजते हैं और तब श्री हनुमानजी और सुग्रीव का मिलन होता है ।
श्री राम और हनुमानजी का मिलन
सुग्रीव वाली के भय से मतंग ऋषि के आश्रम में चले गये । वहां ऋषि के शाप के कारण वाली आ नहीं सकता था । सुग्रीव और श्री हनुमानजी वानर सेना के साथ वहीं पर निवास करते थे । तभी सीताजी की शोध में घुमते हुए श्री राम एवं लक्ष्मण वहां आ पहुंचे । सीताजी जिनको रावण उठाकर अपनी लंका में ले गया था और उन्हें वहां कैद किया था ।
श्री राम-लक्ष्मण को ऋषिमूक पर्वत तरफ आते देखकर सुग्रीव को चिन्ता होने लगी की वाली ने मारने के लिए दो तेजस्वी वीरों को भेजा हुआ है । सुग्रीव ने व्याकुल होकर श्री हनुमानजी को जाँच हेतु भेजा । श्री हनुमानजी ब्राह्मण का वेश धारण कर श्री राम-लक्ष्मण के समीप पहुँचे ।
श्री राम के दर्शन मात्र से श्री हनुमानजी का मस्तक स्वयं श्री राम के चरण में झूक गया
और बाद में श्री हनुमानजी ने नम्रता से पृच्छा की, की आप कौन हो ? श्री रामने अपना परिचय दिया । तब बाद श्री हनुमानजी ने ब्राह्णण का रुप त्याग कर अपने मूल रुप में आकर अपना परिचय दिया और वाली-सुग्रीव की कथा सुनाई । श्री रामने भी अपनी कथा सुनाई और इस तरह भगवान श्री राम और श्री हनुमानजी का मिलन हुआ ।
यह एक अनोखी घटना थी और इस लिए ही श्री हनुमानजी का सर्जन हुआ था ।
लंका दहन
जब रावण सीतामाता को लंका में ले गया था उसी दौरान सीतामाता रावण के रथ से मदद के लिए चीखें लगा रहे थे । तब जटायु गरुड ने उनको रावण से छुड़ाने की काफी कोशिश की परन्तु जटायु सीतामाता को रावण के हाथ से छुड़ा नहीं पाया और रावण के साथ लड़ाई में जटायु के पंख भी कट गये । जब श्री राम – लक्ष्मण, सुग्रीव और श्री हनुमानजी सीतामाता की शोध में जंगल में भटक रहे थे तब उन्होंने जटायु के पंख देखकर चिंता व्यक्त की और घायल जटायु से मिलने पर जटायु ने उनको बताया कि रावण सीतामाता को लंका में ले गया है ।
श्री राम और सुग्रीव ने सीतामाता को अपना सन्देश देने के लिए श्री हनुमानजी को चुना । श्री हनुमानजी को चुनने का हेतु भी विशिष्ट था । श्री हनुमानजी व्याकरण में चतुर एवं निष्णात थे कि रावण से सीतामाता को छोडने के लिए बखूबी कह सकते थे और लंका तक का कठिन सफर लंका तक के विशाल समुद्र को लांघने की शक्ति और दूसरी अनेक अदभुत शक्तियों के कारण श्री हनुमानजी सक्षम थे । श्री राम और सुग्रीव उनकी सभी खूबियों को बखूबी जानते थे ।
श्री हनुमानजी के लिए यह जिम्मेदारीपूर्ण कार्य था और अपने प्रभु श्री राम के लिए कुछ भी करने की तैयारी उनमें थी । उन्हों ने तो प्रभु श्री राम को स्वयं ही सीतामाता को वहां से ले आने की बिनती भी की । लेकिन प्रभु श्री राम भी इसी घटना हेतु सर्जन हुए थे इसीलिए श्री रामने श्री हनुमानजी को लंका सीतामाता को संदेशा भेजने हेतु अपनी पहचान स्वरुप अंगूठी देकर भेजा ।
श्री हनुमानजी इस कार्य के लिए निकल तो पडे लेकिन वो अभी बाल्यावस्था में मिले हुए ऋषि के शाप से प्रभावित थे । उनकी शक्तियां सीमित थी । जब समुद्र किनारे हनुमानजी चिंतीत अवस्था में सोच रहे थे कि यह कार्य वो कैसे सम्भव कर पायेंगे । तब वानरसेना के विद्वान श्री जाम्बुवनने श्री हनुमानजी को अपनी सभी शक्तियों को स्मरण करवाया और शाप के नियमानुसार अगर कोई उनकी शक्तियों का स्मरण करवाये तो शक्तियां वापस आ जायेगी और उनकी सभी शक्तियां वापस आ गयी । शक्ति प्राप्त होते ही महावीर श्री हनुमानजी ने विराट स्वरुप धारण किया और पूरी वानरसेना श्री हनुमानजी के इस स्वरुप को देखकर आश्चर्यचकित हो गई । वानरसेना ने श्री हनुमानजी को नमन किये और “जय श्री राम” और “जय श्री हनुमान” के नारे से पूरी इलाका गुंज उठा ।
विशाल गर्जना और प्रभु श्री राम का नाम लेकर श्री हनुमानजी ने लंका की ओर प्रयाण किया । लंका तक के सफर में विशाल समुद्र था और साथ में श्री हनुमानजी को कई मुसीबतें भी आयी – राक्षस-राक्षसियां, दानव श्री हनुमानजी के कार्य में बाधा डालते रहे लेकिन महावीर श्री हनुमान तो चतुरता और शक्तिपूर्वक सभी बाधाओं को मात देते हुए आगे बढ़ते ही रहे और आखिर में श्री हनुमानजी लंका पहुंच गये । सोने की लंका की भव्यता देखकर श्री हनुमानजी भी दंग हो गये । लंका के भीतर जाने के रास्ते पर का पहरा बहुत ही सख्त था । सभी जगहों पर रावण के दानव का पहरा था । तब श्री हनुमानजीने चतुरतापूर्वक सुक्ष्म (छोटा) स्वरुप धारण कर लिया और लंका मे प्रवेश किया । सोने की लंका इतनी विशाल थी और साथ में अटपटी भी । श्री हनुमानजीने सीतामाता की खोज आरम्भ कर दी । रात का समय था और लंका में रावण ने सीतामाता को कहां छूपाकर रखा है यह खोज बहुत ही कठिन थी । लंका के एक एक शयनखंड की तलाशी लेते हुए श्री हनुमानजी विभीषण के शयनखंड के पास पहुंचे । विभीषण श्री राम का भक्त था और रावण का छोटा भाई था ।
विभीषण द्वारा श्री रामनाम सुनकर श्री हनुमानजी को बड़ा कूतुहल हुआ और विभीषण को योग्य समझकर उनसे पता लगाने के लिए सोचा कि रावण ने सीतामाता को कहां छूपाकर रखा है । ब्राह्मणवेश धारण कर वो विभीषण के पास हाजिर हुए गये और विभीषण सज्जन एवं श्री राम के भक्त प्रतित होने पर श्री हनुमानजीने अपना स्वरुप धारण कर विभीषण को अपना परिचय एवं वे जिस कार्य हेतु लंका आये हैं उस बारे में बताया । विभीषण ने तुरन्त श्री हनुमानजी को पहचान लिए कि वो खुद ही शिवशंकर के अंश है प्रमाण कर कहा की उनको मिलकर वे धन्य हुए है इस पश्चात सीतामाता अशोक वाटिका में है यह बताया । श्री हनुमानजी तुरन्त अशोकवाटिका पहुंचे और वहीं सीतामाता को प्रभु श्री राम की चिन्ता में मग्न बैठा हुआ देखा । राक्षसी का अपने बारे में और श्री राम के बिना वो कितने दुखी हैं उसकी कथा सुनाते हुए सीतामाता को देखकर श्री हनुमानजी की आंखो से भी आंसु निकल आये ।
श्री हनुमानजी ने जब सभी राक्षसीयां सो गई तब श्री राम ने दी हुई अंगूठी उनके पास डाली । श्री राम की अंगूठी देखकर सीतामाता आनंदमय हो गये और आकुल-व्याकुल हो कर आसपास देखने लगे । तब श्री हनुमानजी सीतामाता के समक्ष सुक्ष्म (छोटा) स्वरुप धारण कर उपस्थित हुए और अपना परिचय दिया । पहले तो सीतामाता को यह मायावी रावण की कोई चाल लगी लेकिन इसके शंका समाधान के लिए श्री हनुमानजीने अपना विराट स्वरुप धारण कर श्री रामभक्त है और यहां से वे श्री राम उन्हें जल्द ही ले जायेंगे एसा विश्वास दिलाया । फिर हनुमानजीने उनको भूख लगी है एसा कहा और सीतामाता को नमन कर आगे बढ़े । सीतामाताने भी श्री राम के प्रति हनुमानजी की अगाध भक्ति देखकर उनको अजर अमर का वरदान दीया ।
उसके बाद श्री हनुमानजी अपने भूख संतुष्टि के लिए अशोकवाटिका के वृक्षों से फल खाने लगे । देखते ही देखते श्री हनुमानजी सभी वृक्षों के फल खा गये । इसके बावजूद विराट श्री हनुमानजी की भूख तृप्त नहीं हुई तो एक के बाद एक वृक्ष के फल खाकर वृक्षों को जमीन से उखाड़कर फेंकने लगे । देखते ही देखते पूरी अशोकवाटिका उलट-सूलट हो गई और एसा होते देखकर अशोक वाटिका में हाजिर रावण के पहरेदारो ने हनुमानजी को रोकने के लिए उन पर प्रहार करने शुरु कर दिए । श्री हनुमानजी ने हरेक दानवो एवं राक्षसो को उठाकर पटक दीया । उनकी शक्ति को देखकर राक्षसोंने रावण को सन्देशा पहुंचाया की कोई वानर अशोकवाटिका नष्ट कर रहा है और कई राक्षसो को भी मार दिया है । तब रावण के पुत्र अक्षयकुमार अपने पिता की परवानगी लेकर घटनास्थल पर पहुंचे । लेकिन हनुमानजी को परास्त कर सके एसा कोई दानव था ही नहीं । युद्ध में श्री हनुमानजी ने अक्षयकुमार का संहार किया ।
यह सुनकर रावण दु:खी और गुस्से हो गया । यह देखकर इन्द्रजीत गुस्से में श्री हनुमानजी के पास पहुंचा । इन्द्रजीत भी वीर पुरुष था । उसका श्री हनुमानजी के साथ भीषण युद्ध हुआ । आखिर में कोई अस्त्र या शस्त्र हनुमानजी का बाल भी बांका न कर सके तब इन्द्रजित को ब्रह्मास्त्र का सहारा लेना पड़ा । श्री हनुमानजी ब्रह्मास्त्र को अपनी ओर आता देखकर उसका अपमान न हो इसलिए अपने आप ही बंदी बन गये और रावण के दरबार में हाजिर हुए ।
श्री हनुमानजी ने रावण से विनम्रतापूर्वक श्री राम का संदेशा बताया कि, “में श्री रामदूत हनुमान हुं और में आपको शांति संदेश के साथ कहता हूं की आप माता सीता को मुक्त करो ।” रावण पर अभिमान सवार था, उसने अपने मूर्ख मंत्रीयों की सलाह मानकर श्री हनुमानजी की पूंछ को जलाने और पूरी लंका में घूमाकर अपमानित करने का हुक्म दिया ।
श्री हनुमानजीने अपनी पूंछ इतनी लम्बी कर दी की पूरी लंका के कपड़े कम पड़ गये और दानव उनकी पूंछ बांधते-बांधते थक गये । आखिर में श्री हनुमानजीने उनको अपनी पूंछ को सुलगाने दीया । बाद में श्री हनुमानजी ने विराट स्वरुप धारण कर सबको दंग कर दीया और लंका के तमाम महल, शयनखंड आदी चीजों को आग लगा दी । अशोकवाटिका और विभीषण के महल के अलावा पूरी लंका आग में दहकने लगी । उसके पाद अपनी पूंछ को समुद्र में बुझाकर सीतामाता को वंदन कर उनकी आज्ञा लेकर श्री राम के पास परत आने निकल गये ।
माता सीताजीने भी उनको अपने चूडामणी श्री हनुमानजी को देकर अपनी पहचान श्री राम प्रभु के पास भेज दी ।
श्री हनुमानजी को परत आता देख श्री राम – लक्ष्मण, सुग्रीव एवं समस्त वानरसेना आनंदमय हो गयी और जय श्री राम और जय श्री हनुमान के नारे गुंजने लगे । श्री हनुमानजी ने श्री राम को पूरी कथा सुनाई । सीतामाताने दिये हुए चूडामणी उनको दिये । सीतामाता का दु:ख देखकर समस्त वानरसेना और श्री राम-लक्ष्मण के आँख में से भी आंसु निकल आये ।
श्री रामने श्री हनुमानजी को इस कार्य को सफल बनाने के लिए उनका उपकार हंमेशा श्री राम पर रहेगा कहकर उनको गले लगा दिया । श्री हनुमानजी गदगद् हो गये और अपने आप को अति प्रसन्न गौरान्वित और भाग्यशाली महसूस करने लगे ।
श्री राम और रावण युद्ध
विभीषण के कई बार समझाने पर भी रावण ने सीतामाता को मुक्त नहीं कीया । परिणाम स्वरुप रावण के साथ श्री राम का युद्ध निश्चित था । सुग्रीव ने पूरी वानरसेना को श्रीराम-लक्ष्मण को इस युद्ध में सहाय करने की सूचना दी । एसे भी पूरी वानरसेना प्रभु श्री राम के लिए अपने प्राण न्योछावर करने को तैयार ही थी । रावण द्वारा हुए अपमान और सीतामाता को बंधनमुक्त न करने के कारण विभीषण श्री राम की शरण में आ गये । श्री रामने भी उनका सन्मानपूर्वक स्वागत किया । विभीषण ने भी श्री राम के दर्शन पाकर अपने आप को धन्य महसूस किया ।
समस्त वानरसेना, सुग्रीव, श्री हनुमानजी एवं श्री राम-लक्ष्मण के समक्ष विशाल – लंबा समुद्र लांघकर लंका पहुंचने का विघ्न था । श्री राम ने जलदेवता (समुद्र) को वानरसेना सहित सबको रास्ता प्रदान करने की बिनती की । किन्तु समुद्र देवता एसा नहीं करने पर विवश थे क्योंकि अगर वो एसा करें तो समुद्र में रहने वाले तमाम प्राणी-जीव का मृत्यु होना संभव था । इसलिए समुद्रदेवने विवशभाव से श्री राम की माफी मांग कर उनको बताया की समुद्र पर पुल बांधकर रास्ता पार करें और यह भी बताया की नल और नील वानर को वरदान है की उनके हाथ से डाली हुई चीज जल में डूबेगी नहीं । बस फिर तो, श्री हनुमानजी के साथ पूरी वानरसेना ने बड़े बड़े पत्थर उठाकर श्री रामनाम लिखकर नल और निल को देने लगे और पुल बनता गया और सब आगे बढ़ने लगे । श्री रामनाम लेते हुए पुल समाप्त हुआ और श्री राम-लक्ष्मण, श्री हनुमानजी, सुग्रीव सहित वानरसेना समुद्र लांघकर लंका आ पहुंची ।
लंका आने के बाद लंका के चारो ओर घेरा बनाने के बाद श्री रामने फिर से शांति संदेश के लिए सुग्रीव पुत्र अंगद को परिणाम स्वरुप रावण के पास भेजा । अंगद के शांति संदेश देने के बाद भी रावण अपने अहंकार से बहार न आया और परिणामस्वरुप श्री राम और रावण के बीच में युद्ध हुआ । श्री हनुमानजी युद्ध में श्री राम-लक्ष्मण के साथ रहकर सहायता की और रावण के अनेक दानवों को मात दी । जब श्री राम और उनकी सेना पर रावण पर भारी पड़ने लगी तब रावण ने अपने भाई कुम्भकर्ण का सहारा लिया । कुम्भकर्ण महाकाय एवं शक्तिशाली था । वो भी श्री रामभक्त था । लेकिन अपने भाई रावण की आज्ञा का पालन करते हुए युद्ध में शामिल हुआ और राम के बाण से उसका भी वध हुआ ।
बाद में मेघनाथ जो वरदानो से प्रभावित एवं निपुण था । उसके साथ युद्ध करते हुए उसके बाणों से लक्ष्मण घायल हुए । श्री राम अपने प्यारे भाई लक्ष्मण की यह हालत देखकर व्यत्ति हुए और चिंता में डूब गये । लक्ष्मण मूर्छा से बहार न आनेपर और भी व्याकुल और चिंतातुर हो गये । तब विभीषण ने श्री हनुमानजी को लंका से वैद्यराजजी को लाने को कहा । वैद्यराजजी ने लक्ष्मण को देखा और संजीवनी बुटी ही लक्ष्मण के प्राण बक्ष सकती है एसा बताया । संजीवनी बुटी उत्तर में हिमालय पर्वत पर थी । यह कार्य श्री हनुमानजी के सिवा असम्भव था । श्री हनुमानजी, श्री राम के चरणस्पर्श कर जय श्री राम के नारे के साथ संजीवनी बुटी लेने गये । वहां पहुंचकर संजीवनी बुटी की पहचान न होने के कारण श्री हनुमानजी पूरा पर्वत हिमालय से लेकर घटनास्थल पर आ पहुंचे । और इस तरह लक्ष्मण के प्राण बचाए गये । बाद में युद्ध में श्री हनुमानजी ने अपना विराट स्वरुप धारण कर अपने दोनों हाथ पर श्री राम और लक्ष्मण को बिठाया और मेघनाथ का संहार कीया ।
अहिरावण वध
युद्ध में अपने पुत्रो एवं भाईयों को खोने के बाद अकेले रावण ने श्री राम को मारने के लिये पातालपुरी के राजा अहिरावण को सूचना दी । विभीषण जब प्रातःकाल में समुद्र किनारे गये, तब विभीषण का रुप लेकर अहिरावण सेना में दाखिल हुआ और श्री राम – लक्ष्मण को निद्राधीन अवस्था में बंदी बनाकर पाताल में ले गया । तब सुग्रीव, श्री हनुमान और वानरसेना श्री राम-लक्ष्मण के न मिलने पर उनकी खोज करने लगे । बाद में उनको पता लगा कि अहिरावण उनको पाताल में ले गया है । तब श्री हनुमानजी स्वयं उनको मुक्त कराने हेतु पाताल में गये । श्री राम के लिए श्री हनुमानजी ने पातालपुरी की रक्षा करते स्वयं अपने ही पुत्र मकरध्वज के साथ युद्ध कर उसको बंदी बनाया और अहिरावण के साथ युद्ध कर महाबली श्री हनुमानजी ने अहिरावण का वध कीया और श्री राम-लक्ष्मण को मुक्त कराया । परत आते वक्त श्री राम की आज्ञानुसार अपने पुत्र मकरध्वज को मुक्त कर पातालपुरी का राजा बनाया ।
बाद में श्री राम का रावण के साथ भीषण युद्ध हुआ । जिसके परिणाम स्वरुप रावण का वध हुआ । श्री राम ने विभीषण को लंका का राजा बनाया । विभीषण ने सौप्रथम सीतामाता को सन्मानपूर्वक मुक्त किया ।
रघुनंदन (श्री राम) प्रिय भक्त श्री हनुमानजी,
श्री राम भक्त, रामकथा के रसिक, अजर-अमर, वज्रदेहधारी, वैरागी श्री हनुमानजी, बल के धाम, सकल गुणो की खान, विद्या निधि अष्ट सिद्धि एवं नवनिधिना दाता, सुवर्ण देहधारी, स्वयं प्रकाशक, विवेक चुडामणी, बलवीरो में सरताज, महावीर, जागृतिकार, प्रभुसेवा के सर्वश्रेष्ठ सेवक, दुष्टों के यमराज, सज्जनों के सेवक, मंगलमूर्ति, ब्रह्मचारी, संगीतज्ञ, गरीबनिवाज, शिवस्वरुप, मारुतिनंदन, श्री अंजलिकुमार, केसरीनंदन श्री हनुमानजी को सब के कोटि कोटि वंदन...
श्री हनुमानजी याने चेतना, स्वयंगति, चेतना यानी परमात्मा, परमसत्ता, श्री हनुमानजी शिवजी के ग्यारहवें रुद्र और अजर अमर महाप्रभु है । शिवशंकरजी स्वयं श्री हनुमानजी स्वरुप में है । श्री राम की सेवा करनी और श्री राम में अनन्य निष्ठा रखनी उनका एकमात्र लक्ष्य था ।
सीतामाता की शोध श्री हनुमानजी ने की और माताने उन्हें दो वरदान दीये ।
“अजर अमर गुण निधि सुत हो हूं...” और
“अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता, असरवदीन जानकी माता!”
जो मनुष्य श्री हनुमानजी की सच्चे हृदय से प्रार्थना भक्ति करता है उसके सभी कष्ट दूर होते हैं । भूत-पिशाच भी उनकी निकट नहीं आ सकते हैं और बदी से वो दूर रहता है । भारत में ज्यादातर हनुमान मंदिरो में आज भी जो भूत-पिशाच के शिकार लोग मंदिर परिसर में दाखिल होते ही व्यक्ति के शरीर में रहा पिशाच पीडाकारी होकर भाग जाता है । जो कोई स्थान पर रामकथा हो वहां श्री हनुमानजी के लिए अलग आसन रखा जाता है । वहां श्री हनुमानजी अद्दश्य रुप से बिराजमान होकर रामकथा सुनते हैं । उनके हृदय में श्री राम – सीताजी सदा बिराजमान है । समस्त जगत को सीताराममय समझकर प्रणाम करते रहो । श्री हनुमानजी प्रत्यक्षरुप है उनका और श्री राम का नाम जपते रहो ।
जय श्री राम...जय श्री हनुमान...