श्री केम्प हनुमानजी मंदिर का लघु इतिहास
अंग्रेजो के शासन में केम्प हनुमान मंदिर जलालपुरा गांव के हनुमान मंदिर के नाम से पहचाना जाता था । अहमदाबाद शहर में गायकवाड की हवेली आर्मी केन्ट थी । वहां से अंग्रेजो ने हनुमान मंदिर के पास आर्मी थाना खड़ा कीया । मंदिर के पास उनकी अस्पताल भी थी । एक अंग्रेज अमलदार ने मंदिर के पूजारीयों को मंदिर दूसरी जगा ले जाने की बात की । लेकिन भक्तों एवं पूजारीयों ने मना कर दीया । अंग्रेजो ने मंदिर के पास आयी हुई धर्मशालाएं भी तोड दी । छोटे मंदिरो को भी नष्ट कीया और केम्प हनुमानजी मंदिर को भी नष्ट करने का हुक्म दीया । इसके साथ ही लाखो काले और पीले भंवरो ने आकर मंदिर की दिवाल पर रक्षण हेतु इकठ्ठा हो गये । अंग्रेज अमलदार ने कई दिनों तक भंवरो को दूर करने के लिए मजदूर भेजे लेकिन भंवरे उन मजदूरों पर ही आक्रमण करते थे । यह देखकर अंग्रेज अमलदार को इस घटना को श्री हनुमानजी दादा का चमत्कार बताते हुए निर्णय बदलना पड़ा की मंदिर यहीं पर रहेगा । अहमदाबाद के विकास के पहले भी हजारो भक्तों प्रभु को सच्चे दिल से प्रार्थना, अरज कर मनवांछित फल प्राप्त करते थे और आज भी सर्व भक्तो की मनोकामना प्रभु उनके पुरुषार्थी को सफलता प्रदान करते हैं ।
उपरोक्त ऐतिहासिक प्रसंग वंदनाबेन शुक्ल, शास्त्रीनगर, अहमदाबाद विक्रम संवत 2039, सने 1983 अखात्रीज के दिन अतिविस्तारपूर्वक श्री केम्प हनुमानजी का पुस्तक प्रकाशित किया था उसमें से लिया गया है ।
इस उपरांत, भारत के प्रथम स्त्री प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी भी चुनाव में विजय पाते ही दिनांक 9 मार्च, 1980 के रोज रविवार के दिन स्वेच्छानुसार श्री माधवसिंहजी सोलंकी और श्री घनश्यामजी पंडित के साथ श्री केम्प हनुमानजी के मंदिर में दर्शन एवं आशिर्वाद प्राप्त करने आये थे ।
श्री केम्प हनुमानजीने बदला हुआ क्लेवर
(वैशाख सुद 6 बुधवार ता. 3 जून 1953 के दिन दैनिक अखबार संदेश एवं गुजरात समाचार में छपा हुआ लेख)
अहमदाबाद के ऐतिहासिक केम्प के हनुमानजी के मंदिर में आज एक अदभुत एवं चमत्कारिक घटना घटी थी ।
आज रात साडे दस से ग्यारह बजे के बीच में हनुमानजी की आरती परिपूर्ण होने के बाद पूजारी शंकरप्रसादजी, बद्रीप्रसादजी एवं भगवतप्रसादजी बहार नीकले और थोडी ही देर में हनुमानजी की मूर्ति ने नया रंग बदला । हलकी आवाज के साथ मूर्ति पर लगा हुआ सुवर्ण एवं चांदी का वरखवाला पुरातन क्लेवर नीकल गया और हनुमानजी की आबेहूब प्रतिमा जैसे की आज ही नयी लगायी गई हो एसी दीखाई दी थी । हनुमानजी ने अपना कलेवर बदला उसके कारण उस पर लगा हुआ सोने-चांदी का 6-7 मण वरख तूटकर गिरा था और हनुमानजी की आबेहूब और अलौकिक मूर्ति के दर्शन हुए थे ।
एसा कहा जाता है कि भगवान रामचंद्रजीने सीताजी को ढूंढने के लिए जो मुद्रिका अर्पण की थी और उस मुद्रिका को लेकर हनुमानजी सीताजी की शोध में अशोकवाटिका गये थे उसी वक्त हनुमानजी ने इस स्थान पर विश्राम किया था उसी प्रसंग की यह मूर्ति है । मूर्ति पर से पुराना कलेवर दूर होते ही हनुमानजी के एक हाथ में सोने की मुद्रिका स्पष्ट दिख रही है और इसीलीए उस प्राचीन दंतकथा को आज समर्थन मिला है ।
संकलनकर्ता: श्री श्यामसुंदरजी पंडित
श्री केम्प हनुमानजी मंदिर के चमत्कार
शास्त्रो में कहा गया है कि “श्रद्धावान लभ्यते ज्ञानम्” श्रद्धा एवं परिश्रम, विश्वास एवं भक्ति से हरेक कार्य में सफलता अवश्य मिलती है । यह सभी धर्मों में कहा गया है । गीता में भी सच ही कहा गया है कि “स्व धर्म निधनं श्रेय” । हरेक व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करते हुए मरना ही श्रेष्ठ है । हरेक धर्म के महापुरुषों, देवता ने समयानुसार कई चमत्कार किए हैं इस लिए ही वे महान कहे जाते हैं, पूजनीय है, श्रद्धा के प्रतीक है । यहां केम्प हनुमानजी के कुछ प्रत्यक्ष चमत्कार को सादर करते हैं ।
अंग्रेज शासनकाल में एक आर्मी अफसर को भी हनुमानजी का चमत्कार हुआ था । उसने सत्ता के मद में मंदिर के भक्तों, पुजारीयों को परेशान किया । फिर चमत्कार हुआ और खुद मानसिक एवं शारीरिक पीडा से परेशान हुआ और मनन चिंतन के बाद उसे लगा कि भगवान के मंदिर, भक्तों को परेशान करने के कारण ही स्वयं दुखी हुआ है । एक रोज सुबह पांच बजे जैसे ही मन्दिर के द्वार खुले तब वो प्रभु के पास आकर बैठ गया । प्रभु एवं पुजारी से क्षमा मांगी और सत्ता का दुरुपयोग मंदिर के विरुद्ध करना बंद किया । यह एक सत्य प्रसंग है । जिसका समावेश पुस्तक में है । वो हिन्दु नहीं था फिर भी वो मंदिर का भक्त बना ।
एसा ही एक दुसरा अनुभव एक अंग्रेज अफसर को हुआ । किसी हिन्दु नौकर ने संतानप्राप्ति हेतु अंग्रेज पति-पत्नी को मानता रखने की सलाह दी । और उनको पुत्र प्राप्ति हुई । वो अफ्सर बेन्ड के साथ केम्प हनुमान मंदिर दर्शन करने हेतु आये थे । पुजारी श्री बदरीप्रसादजी से प्रेरणा लेते हुए शनिवार के दिन पोलीस बेन्ड बजाने का हुक्म दिया था । उसका पालन आजतक नियमित रुप से किया जाता है ।
एसे प्रसंगो को पुस्तक स्वरुप में संग्रह किया जाये तो हजारों भक्त परीक्षा, शादी-ब्याह, संतान-प्राप्ति, कोर्ट-कचहरी, केस में विजयी, चुनाव में विजयी और अनेक कार्यसिद्धि के प्रसंग शामिल हो सकते हैं । आज भी श्री काशीरामजी राणा और श्री हरिनभाई पाठक इत्यादि जैसे कई महानुभाव शनिवार के दिन दर्शन हेतु आते हैं ।
तीसरा चमत्कार 2 जून, 1953 मंगलवार के दिन हुआ था ।
स्व.पुजारी श्री बदरीप्रसादजी गजानंदजी उस समय सुबह-शाम पूजा करते थे । सुबह 4 बजे, 12 बजे और शाम को 4 बजे नदी स्नान कर त्रिकाल संध्या करते थे ।
1953, 2 जून मंगलवार रात को 10 बजे एक धमाके के साथ मूर्ति का कलेवर नीचे गिर गया था । हाजिर सब दौडकर अन्दर आये और यह द्रश्य देखकर चकित और आनंदित हुए थे । मूर्ति में पहले दो आंखे ही दिखती थी । अंदर की आज की मूर्ति के स्वरुप को कोई जानता नहीं था । जो मूर्ति प्रगट हुई उसमें मनुष्य मुखाकृतिवाले हनुमानजी, ब्राह्मण वेश में लंका में विभीषण को मिलने गये थे उसी प्रकार के दिख रहे थे । पिताम्बर और खेसधारी, सर पर मुकुट, पिताम्बर के पीछे पूंछ, हाथ से आशीर्वाद देते हो इस प्रकार का द्दश्य, दूसरे हाथ में मुद्रिका (अंगूठी), धारण की हुई जिसमे चमकता हीरा । एसा द्दश्य देखकर लाखों लोग दूसरे ही दिन से उमट पडे । एसा प्रसंग समस्त भारत देश में शायद प्रथम ही था । हर सुद चौदश के दिन श्री हनुमानजी को तेल, सिंदूर और वरख चढाया जाता है उसी वक्त समग्र मूर्ति के (सुबह-शाम पूजा के समय) सुंदर दर्शन प्राप्त होते हैं । सुबह-शाम हररोज फुलों का शणगार किया जाता है । मूर्ति का कलेवर बदलाये हुए 2003 के 2 जून सोमवार के दिन बड़े धामधूम एवं हर्षोल्लासपूर्वक पचास वर्ष पूर्ण हो रहे हैं । मूर्ति का क्लेवर बदलाने पचास वर्ष पूर्ण होने की खुशी में 1 जून रविवार के दिन धार्मिक प्रसंगो द्वारा मनाया गया था ।
श्री केम्प हनुमानजी मंदिर ट्रस्ट की तरफ से मूर्ति प्रागट्य सुवर्ण जयंति महोत्सव महंत श्री गोरधनप्रसादजी शर्मा, प्रमुख श्री पार्थिवभाई अध्यारु और ट्रस्टीश्री अरुणभाई शाह, मेनेजींग ट्रस्टी श्री विष्णुप्रसाद शर्मा द्वारा प्रासंगिक कार्यक्रम अनुसार है । 1 जून, 2003 रविवार को श्री हनुमानजी रथयात्रा सुबह 8 बजे नीकल कर पालडी नारायणनगर के पास वायुदेवता मंदिर गई । रात को 8 से 11 बजे तक संतो का स्वागत, प्रवचन एवं पुस्तक विमोचन तथा भजन सम्राट निरंजन पंडया के भजनों का आयोजन किया गया था । हजारो भक्तोंनें इसमें भक्तिभावपूर्वक हिस्सा लिया ।
2 जून सोमवार मूर्ति प्रागटय दिवस था पर सुबह 5-30 बजे मंगला आरती हुई । छप्पनभोग धराया गया । सुबह 8 से 10 सुंदरकांड पाठ श्री नंदकिशोरजी शास्त्रीजी ने किया और 10 से 4 बजे तक हनुमंतयाग यज्ञ सम्पन्न हुआ ।
27 में 2003 मंगलवार को उपराष्ट्रपतिजी श्री भैरवसिंहजी शेखावत दोपहर 12-15 बजे श्री केम्प हनुमानजी के मंदिर दर्शन हेतु पधारे थे ।
श्री गजानंदजी श्री हनुमानजी के अनन्य उपासक थे । वे केम्प सदर बाजार में रहते थे । एक मंगलवार के रोज वे भद्रकाली मंदिर से परत आ रहे थे । उस वक्त मंदिर होकर आने का रास्ता था । मंदिर के पास में एक पडछंद शरीरवाले साधु महाराज ने उन्हें अपने पास बुलाया । उस जमाने में शहेर के हरेक मंदिर के बाहर साधुओं के अखाडे रहते थे । गजानंदजी ने पूछा की महाराज क्या आज्ञा है ? आपकी में क्या सेवा करुं ? साधु के वेश में श्री हनुमानजी ने कहा की तुम्हारे पास जो कुछ खाने की चीज हो वो रख दे । गजानंदजी ने आटे की पोटली रख दी और अपनी रस्सी से लोटे में पानी भर के ले आये । महाराजश्री ने कच्चा आटा खा लिया और पानी पीया । गजानंदजी के साथ बहुत सारी बातें भी की, सूचनाएं दी और फिर पानी लाने भेजकर वे अद्दश्य हो गये । पू. गजानंदजी उस जगह आये । महाराजश्रीने उनकी चारोओर शोध की । लेकिन साधु महाराज का कोई पता नहीं चला । अपना सामान लेते ही सोने की पादुकाएं दीखी । वो उन पादुकाओं को घर ले गये और अपनी पत्नी एवं पुत्रीको पादुकाएं बतायी । वो समझ गये थे के मेरे प्रभु श्री हनुमानजी पधारे थे । दूसरे दिन केम्प हनुमान मंदिर में प्रभु की मूर्ति के पास वो पादुकाएं रख दी । पादुकायें बाद में वहां से भी अपने आप अद्दश्य हो गयी ।

दूसरा प्रसंग :
एक बार श्री गजानंदजीने अहमदाबाद के बारह दरवाजों के समस्त साधुओं को भंडारा कर भोजन हेतु आमंत्रित किया । साधुओं के भोजन की व्यवस्था की । अषाढ मास था । बादल घिर गये, रसोई के बाहर जगन्नाथजी मंदिर के महंत श्री बैठे थे । उन्हों ने कहा की गजानंद बादल बरसेंगे तो रसोई बिगड जायेगी । साधु कादव-कीच्चड में बैठ नहीं पायेंगे और बिना भोजन कीये चले जायेंगे । वायुपुत्र श्री केम्प हनुमानजी को जाकर प्रार्थना कर तो बादल हट जायेंगे । श्री गजानंदजी हनुमानदादा के पास अक्षुभावपूर्वक प्रार्थना करने लगे कि आप पवनदेव को बुलाकर बादल हटायें नहि तो भक्त बिना भोजन किये ही चले जायेंगे । श्री हनुमान दादाने उनकी प्रार्थना सुन ली । चमत्कार हुआ वायुदेव का आगमन हुआ, तेज गति का पवन सभी बादलो को खींचकर ले गया । साधुओं ने प्रेमपूर्वक भोजन कीया और फिर शाम को मुसलाधार बारिश हुई ।
तीसरा प्रसंग :
साधुवेश में भगवानने श्री गजानंदजी को कहा था कि तेरा मृत्यु शनिवार के दिन होगा । श्री गजानंदजी मंगलवार के दिन अपने परिवार के साथ बैठे थे तभी उनको प्रभु दिखे और कहा की आज में तुजे अपने धाम में लेने के लिए आया हूं । गजानंदजी प्रभु के साथ बात कर रहे थे लेकिन परिवार की किसी भी व्यक्ति को वो दिखे नहीं । गजानंदजी ने कहा, प्रभु आपके धाम में चलने के लिए में तैयार हुं लेकिन साधुवेश में दिया हुआ आपका बचन के मेरा मृत्यु शनिवार के दिन होगा वो मिथ्या होगा, वरना जैसी आपकी आज्ञा । प्रभुने शनिवार को आने का कहा और चार दिन के बाद हनुमानजी पधारे । शनिवार की शाम अपने पुत्रो को बुलाया, सलाह-सूचन दिये और आँखे बंदकर साकेत लोक (स्वर्ग लोक) में प्रयाण किया । एसे संत शायद ही मिलते हैं । उन्हें सबके कोटि कोटि वंदन ।
उसके बाद पूज्य संत गजानंदजी का वारसा पूजारी श्री बदरीप्रसादजीने संभाला । वेसे ही गुण, संस्कार, भक्ति, वैराग्य, त्याग, सेवा एवं उदारता थी । वो साठ साल तक जीये तब तक त्रिकाल संध्या की, तीन बार साबरमती में स्नान करने जाते थे । कुएं या नदी के सिवाय आजीवन अन्य पानी नहीं पीया । हिमालय क्षेत्र के तीर्थधाम सिवाय यात्रा करते नहीं । अपने घर और मंदिर के सिवा किसी भी के वहां पानी या भोजन लीया नहीं । दोनो समय की आरती आजीवन उन्होंने ही की थी । योगानुयोग आज भी प्रभु कृपा से सुबह की आरती उनके सुपुत्र परसोत्तमभाई करते हैं । उन्होंने भी अपने मृत्यु का समय अमावस्या कहा था और उसी दिन वो प्रभु के धाम में गये । परिवार संप से पूजा करता है यह श्री हनुमानदादा की असीम कृपा का परिणाम है । प.पूजय महंत श्री गोरधनप्रसादजी गजानंदजी के चौथे क्रम के पुत्र हयात है । उनके आशीर्वाद, मार्गदर्शन, संचालन एवं नेतृत्व में मंदिर का कार्य सुचारुरुप से चल रहा है । प्रभु उनको शतायु करे एसी अभ्यर्थना ।
- पुजारी द्वारकाप्रसाद शंकरप्रसाद पंडित